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काव्य-संसार
जलता है वो सूरज सा
मुहब्बत सी नशीली चाँदनी
स्त्री प्यार देती है
रख गया गुलाब कब्र पर
रोटी तुमको राम ना देगा
एक फूल उदास है दूसरे फूल के बिना
सखी, तुम गगन में धीरे-धीरे
तुम, मुझमें लिखी जा रही कविता
सौंधी-सौंधी आँखों से
हमशक्ल तुमसे, मेरे दिन
कोई आवाज तो आए मुझ तक
महामिलन की प्रतीक्षा में बैठा चाँद
अभी-अभी तू फिर याद आई
तुम्हारी शाश्वत उपस्थिति
तुझे ज़िंदगी यूँ बिता कर चले
शुभ दीप आह्वान
गुमशुदा दीप
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
मनाएँ दीपपर्व इस रूप में
अमलतासी फूलों-सी सजी तुम
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