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हमारी पसंद
दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के
ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ...
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
अशआर : (मजरूह सुलतानपुरी)
ग़ज़ल में तसव्वुफ़ (भक्ति भाव)
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मैं अक्सर चाँद पर जाता हूँ
जान लेने का हक़ नहीं वरना
जोया के अशआर
दिल से पहुँची तो हैं
आप बन्दा नवाज़ क्या जानें
फ़ाज़िल अंसारी के अशआर
मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मुफ़लिसी सब बहार खोती है
ख़ुदा है वो भी
ख़ुदा है वो भी
ख़ुदा ऎसे मुखड़े बनाता है कम
आज तुम याद बेहिसाब आए
इस बदलते दौर में
मुनव्वर राना के मुनफ़रिद अशआर
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