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आज का शेर
उल्फ़त व मोहब्बत समझे ही नहीं
इश्क़ वो नासूर है
जिसे हम टूट कर चाहें
जाने वाले चले गए तन्हा
उसकी आँखों में आ गए आँसू
देखना तेरे इक इशारे पर
कह दिया तूने मुझे दुश्मने जानी कैसे
फ़लक देता है जिनको ऐश
अभी इश्क़ के इम्तेहाँ
तितली को उड़ाकर देखो
कभी खुशी से खुशी की तरफ नहीं देखा
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
सहरा में मेरे हाल पे कोई भी न रोया
कोई नहीं है बेवफा अफसोस मत करो
तुम्हें तलाश किसी बेवफा की थी
अपनी आग में खुद जल जाएँगे
मुहब्बत नहीं एहसान किया है
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
नज़र मिलाते नहीं मुस्कराए जाते हैं
वफा में कोई मुझसा और तुमसा बेवफाई में
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