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नीति नियम
(बुधवार 2 जून 2010)     
सनातन धर्म भाग्यवादियों का धर्म नहीं है। वेद, उपनिषद और गीता- तीनों ही कर्म को कर्तव्य मानते हुए इसके महत्व को बताते हैं। यही पुरुषार्थ है, जो व्यक्ति भाग्य, ज्योतिष या भगवान भरोसे है उसको भी कर्म किए बगैर छुटकारा नहीं मिलने वाला। धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं।
(मंगलवार 4 मई 2010)     
ईश्वर उपदेश करता है कि राजा और प्रजा के पुरुष मिल के सुख प्राप्ति और विज्ञानवृद्धि कारक राज्य के संबंध रूप व्यवहार में तीन सभा अर्थात- विद्यार्य्यसभा, धर्मार्य्यसभा, राजार्य्यसभा नियत करके बहुत प्रकार के समग्र प्रजा संबंधी मनुष्यादि प्राणियों को सब ओर से विद्या, स्वतंत्रता, धर्म, सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें।
(मंगलवार 27 अप्रैल 2010)     
पुष्‍ट शरीर, बलिष्ठ मन, संस्कृत बुद्धि एवं प्रबुद्ध प्रज्ञा लेकर ही विद्यार्थी ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। विवाह कर वह सामाजिक कर्तव्य निभाता है। संतानोत्पत्ति कर पितृऋण चुकता करता है। यही पितृ यज्ञ भी है। पाँच महायज्ञों का उपयुक्त आसन भी यही है।
(गुरूवार 11 मार्च 2010)     
धर्म से मोक्ष और अर्थ से काम साध्‍य माना गया है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व है। वानप्रस्थ और संन्यास में धर्म प्रचार तथा मोक्ष का महत्व माना गया है। ब्रह्मचर्य का अर्थ होता है ब्रह्म को चरना या ब्रह्म की चर्चा व चर्चा में ही रत रहना। दूसरा अर्थ जो प्रचलित है वह है इंद्रियों का संयम रखना। विद्यार्थी और सन्यासी का यह कर्तव्य है कि वह इंद्रियों पर संयम रखकर ईश्वर परायण रहे।
(सोमवार 18 जनवरी 2010)     
जब सूर्य 'उत्तरायण' होता है तो उत्सव का माहौल होता है। 'मकर संक्रांति' एक उत्सव है और जब सूर्य की दक्षिणायन गति होती है तो व्रतों का माहौल होता है। 'श्राद्ध कर्म' व्रत और पूण्य कर्म है। श्राद्ध कर्म के पूर्व व्रतों का पालन किया जाता है।